Saturday, October 23, 2021

याद

तेरी यादों में जर्रा-जर्रा रहने लगा हूँ मैं। 
तू कहती नहीं, बहुत कुछ कहने लगा हूँ मैं।। 
दिल के दरख़्त पर , अरमान रख दिये सारे। 
तेरी यादों के किस्से हैं, जिनमें बहने लगा हूँ मैं।। 

आकाश राघव

Friday, September 17, 2021

शोषण

महज जलाये जाते रहे हैं दिये 
लालकिले की बड़ी दीवारों के सामने
जिस दिन दहक उठेंगी चिताएँ 
बंद हो जायेगा जिस्मों से खिलवाड़

Thursday, September 16, 2021

रोजमर्रा की जिन्दगी

मैंने दिया संभावनाओं को जन्म
तत्पश्चात चुनी गई मंजिल
करती हुई हर अहं को चकनाचूर
और लिख डाला गया एक सच
जिसमें अंतर्निहित थी कटु व्यंजना
कचरे के ढेर पर पढ़ा छप्पन भोग
वहीं पास के ढेर पर करता हुआ
भूखा एकत्र सूखे रोटी के चंद टुकड़े
फुटपाथ पर किल्कारी मारते बच्चे
आत्महत्या करता हुआ किसान 
शहीद होता हुआ देश का गौरव 
अंतिम चिता पर लेटा हुआ न्याय
शायद यहीं कहीं मरा पड़ा था
अपनी कलम से सत्य वांचने वाला
बस शेष था तो एक समर 
जिसे होते ही होगी क्रांति 
जिसमें लेंगी समस्त भाषाएँ भाग 
अंततः शायद हो जाए खंडित
मिथ्यावादी मानसिकता की परिभाषा
और लिखा जाए इतिहास पुनः
नवीन सोच को ध्यान में रखते हुए

आकाश राघव