मैंने दिया संभावनाओं को जन्म
तत्पश्चात चुनी गई मंजिल
करती हुई हर अहं को चकनाचूर
और लिख डाला गया एक सच
जिसमें अंतर्निहित थी कटु व्यंजना
कचरे के ढेर पर पढ़ा छप्पन भोग
वहीं पास के ढेर पर करता हुआ
भूखा एकत्र सूखे रोटी के चंद टुकड़े
फुटपाथ पर किल्कारी मारते बच्चे
आत्महत्या करता हुआ किसान
शहीद होता हुआ देश का गौरव
अंतिम चिता पर लेटा हुआ न्याय
शायद यहीं कहीं मरा पड़ा था
अपनी कलम से सत्य वांचने वाला
बस शेष था तो एक समर
जिसे होते ही होगी क्रांति
जिसमें लेंगी समस्त भाषाएँ भाग
अंततः शायद हो जाए खंडित
मिथ्यावादी मानसिकता की परिभाषा
और लिखा जाए इतिहास पुनः
नवीन सोच को ध्यान में रखते हुए
आकाश राघव